अमेठी में सपा पर ‘धनबलियों’ का साया? अखिलेश के स्वागत में ‘ हाशिए पर दिखे असली सिपाही’ ।
अक्षय मेल समाचार अमेठी। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सुल्तानपुर में एक निजी कार्यक्रम में शिरकत करने के दौरान अमेठी की सियासी तस्वीर एक बार फिर चर्चा में आ गई। अमेठी से गुजरते समय अखिलेश यादव के स्वागत के लिए जुटी भीड़ ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और ‘धनबलियों’ के बढ़ते असर पर नए सवाल खड़े कर दिए।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सोमवार को जैसे ही अखिलेश यादव का काफिला अमेठी के मुसाफिरखाना सीमा में दाखिल हुआ, सड़क के दोनों ओर कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। लेकिन इस भीड़ में पार्टी के पुराने, जमीनी कार्यकर्ता—जिन्हें आमतौर पर ‘असली सिपाही’ कहा जाता है—किनारे खड़े नजर आए। स्वागत की अगली कतार में वे चेहरे दिखे जो पिछले कुछ समय से आर्थिक रूप से मजबूत माने जा रहे हैं और जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘धनबली’ कहा जा रहा है।
*गाड़ी में कौन बैठा, किसे मिला कितना वक्त?*
सबसे ज्यादा चर्चा उस क्षण की रही जब अखिलेश यादव की गाड़ी में कुछ चुनिंदा स्थानीय नेताओं को बैठाया गया। सूत्र बताते हैं कि कुछ नेताओं को तो गाड़ी में साथ ले लिया गया, जबकि सालों से संगठन के लिए पसीना बहाने वाले सपा के कई कद्दावर नेताओं को एक मिनट का समय भी मुश्किल से मिल पाया।
सुबह 9 बजे से सड़क पर खड़े थे। माला लेकर इंतजार किया। नेताजी की गाड़ी आई, रुकी, लेकिन मुलाकात उन्हीं से हुई जो कई बड़ी गाड़ियों का काफिला लेकर आए थे।”
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे तल्ख पहलू वह था जब गाड़ी में बैठे एक स्थानीय नेता अंदर से मुस्कुराते हुए सड़क पर खड़े दूसरे कद्दावर नेता की तरफ देख रहे थे। मौजूद लोगों ने इसे ‘ताकत का प्रदर्शन’ करार दिया। सड़क पर खड़े कार्यकर्ताओं के बीच दबी जुबान यही चर्चा थी कि ‘गाड़ी में बैठना’ अब सियासी हैसियत का नया पैमाना बन गया है—विचारधारा और संघर्ष नहीं।
*‘भीड़’ बनाम ‘सिपाही’*
अमेठी में समाजवादी पार्टी का एक बड़ा वर्ग मानता है कि 2024 लोकसभा और उसके बाद 2027 विधानसभा की तैयारी में पार्टी को अपने पुराने कैडर को साथ लेकर चलना होगा। लेकिन सोमवार की तस्वीर कुछ और कहानी बयां कर रही थी। स्वागत में लाई गई भीड़ का बड़ा हिस्सा किराए की गाड़ियों और संसाधनों से लैस था। पोस्टर-बैनर से लेकर नारे लगाने वालों तक—हर जगह ‘मैनेजमेंट’ साफ दिख रहा था।
स्थानीय स्तर पर सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पार्टी धीरे-धीरे उन लोगों के चंगुल में फंसती जा रही है जिनके पास संसाधन तो हैं, लेकिन जमीनी पकड़ नहीं? अगर ‘असली सिपाही’ हाशिए पर जाएंगे तो बूथ-मैनेजमेंट कौन करेगा—यह सवाल संगठन के भीतर बेचैनी बढ़ा रहा है।
*संगठन में हलचल*
अखिलेश यादव के जाने के बाद देर शाम तक जिला स्तरीय कई नेताओं के बीच फोन पर लंबी मंत्रणा चलती रही। एक गुट का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का समय सीमित था, इसलिए सबको वक्त नहीं मिल पाया। वहीं दूसरा गुट इसे ‘सोची-समझी रणनीति’ बता रहा है जिसके तहत पुराने नेताओं को किनारे किया जा रहा है।
*आगे की राह*
अमेठी सपा के लिए हमेशा प्रतिष्ठा की सीट रही है। 2027 से पहले पार्टी को गुटबाजी और ‘धनबल बनाम जनबल’ की इस लड़ाई से उबरना होगा। सोमवार की घटना ने कार्यकर्ताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आने वाले दिनों में निष्ठा से बड़ी गाड़ी हो जाएगी?
फिलहाल अमेठी की सड़कों पर यह सवाल तैर रहा है—गाड़ी में बैठने वालों की हंसी कहीं पार्टी की जमीनी हकीकत पर भारी न पड़ जाए।
फिलहाल यह रिपोर्ट प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं से हुई बातचीत पर आधारित है। पार्टी की ओर से इस पर आधिकारिक बयान नहीं आया है।
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