अंधेरे में डूबता असली भारत।
विद्युत कटौती एवं दुर्व्यवस्था से सदमे में देश का अन्नदाता और ग्रामीण उपभोक्ता।
हरि प्रसाद यादव।
उत्तर प्रदेश में विद्युत व्यवस्था चरमा गई है। शहर जगमगा रहे हैं और गांव अंधेरे में कराह रहे हैं। किसान का धान खेत में पानी के लिए तरस रहा है, और ग्रामीण उपभोक्ता रात-रात भर नींद को तरस रहा है। सरकार 24 घंटे बिजली का दावा करती है, पर सच यह है कि आपूर्ति का बंटवारा बराबर नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि क्या गांव में रहने वाला अन्नदाता/ किसान ग्रामीण उपभोक्ता इस देश का नागरिक नहीं है? अन्नदाता ही अंधेरे में रहेगा तो देश कैसे चमकेगा? यह सौतेला व्यवहार बंद होना चाहिए। शहर और गांव में बिजली का भेद खत्म करो, नहीं तो ग्रामीण आक्रोश बिजली से भी तेज करंट मारेगा।
उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा अन्न भंडार है, आज एक गहरे अंधेरे से गुजर रहा है। यह अंधेरा सिर्फ बिजली के तारों का नहीं है, यह व्यवस्था की नीयत का अंधेरा है। शहरों की चकाचौंध में जहां मॉल, शोरूम और एसी वाले बंगले 24 घंटे निर्बाध बिजली का सुख भोग रहे हैं, वहीं गांव में, असली भारत में, किसान टकटकी लगाए ट्रांसफार्मर की तरफ देख रहा है। धान की फसल, जो इस समय पानी मांग रही है, सूख रही है। किसान की आंखों की नींद उड़ी हुई है। यह सिर्फ विद्युत कटौती नहीं है, यह देश के अन्नदाता के साथ किया जा रहा सौतेला व्यवहार है, जो अब सदमे में बदल चुका है।
आज विद्युत विभाग ने उत्तर प्रदेश में दो तरह के भारत बना दिए गए हैं। एक शहरी भारत, जहां फीडर सेपरेशन, स्मार्ट मीटर और वीआईपी रोस्टर के नाम पर 22 से 24 घंटे बिजली दी जा रही है। और दूसरा ग्रामीण भारत, जहां घोषित रोस्टर 18 घंटे का है, पर मिल रही है 8 से 10 घंटे, वो भी टुकड़ों में।
रात में जब शहरी उपभोक्ता कूलर और एसी में सो रहा होता है, तब ग्रामीण इलाके में, खासकर अमेठी सुल्तानपुर बुंदेलखंड के करवी, चित्रकूट, बांदा जैसे क्षेत्रों में, पूरी-पूरी रात लाइट गायब रहती है। किसान रात में उठकर देखता है कि लाइट आई तो मोटर चालू करे, पर जब लाइट आती है तो वोल्टेज इतना कम होता है कि मोटर जलने की कगार पर पहुंच जाती है।
सवाल उठता है - क्या गांव के लोग टैक्स नहीं देते? क्या किसान बिजली का बिल नहीं भरता? फिर उसके साथ ये भेदभाव क्यों? क्या इसलिए कि उसकी आवाज शहरों की तरह तेज नहीं है?
विद्युत कटौती और दुर्व्यवस्था से धान की फसल में किसान की सांसें अटकी हुई है।इस समय खरीफ की सबसे महत्वपूर्ण फसल धान खेत में खड़ी है। वैज्ञानिक कहते हैं कि धान में बाली निकलने और दूध भरने के समय सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है। अगर इस समय 3-4 दिन भी सिंचाई छूट गई तो पैदावार 30 से 40 प्रतिशत तक गिर सकती है।
किसान ने महंगे बीज खरीदे, DAP और यूरिया ब्लैक में लेकर डाली, दिन-रात खेत में मेहनत की। अब जब फसल को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब नहरें सूखी हैं और ट्यूबवेल के लिए बिजली नहीं है। डीजल इतना महंगा है कि डीजल इंजन से सिंचाई करना घाटे का सौदा है। 100 रुपये लीटर डीजल में एक बीघा धान सींचने पर 1000 रुपये खर्च हो रहा है। किसान करे तो क्या करे?
यही कारण है कि किसान सदमे में है। वह कर्ज लेकर फसल लगाता है और अब फसल सूखती देखकर उसकी रातों की नींद उड़ गई है।
रात्रि का अंधेरे में ग्रामीण का जीवन नरक हो गया है।
बिजली सिर्फ खेत के लिए नहीं, जीवन के लिए भी जरूरी है। गांव में रात होते ही अंधेरा पसर जाता है। बच्चे पढ़ नहीं पाते, क्योंकि इन्वर्टर 2 घंटे में जवाब दे जाता है। बुजुर्ग गर्मी और उमस में तड़पते हैं। महिलाएं अंधेरे में खाना बनाती हैं। जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा अलग। वही दूसरी तरफ शहर में 2 मिनट बिजली जाने पर हंगामा हो जाता है, मीडिया चिल्लाने लगता है। पर गांव में 12 घंटे अंधेरा रहता है तो कोई सुनने वाला नहीं। क्या यही रामराज्य है? क्या यही सबका साथ, सबका विकास है?
इस चरमराई व्यवस्था के कई कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है -मेंटेनेंस के नाम पर खानापूर्ति। ग्रामीण फीडरों पर जर्जर तार, टेढ़े पोल और ओवरलोड ट्रांसफार्मर लगे हैं। एक आंधी आते ही पूरा सिस्टम बैठ जाता है। अधिकारी मेंटेनेंस के नाम पर सिर्फ कागज भरते हैं।
ओवरलोड और चोरी का बहाना भी कारण है। विभाग हर बार ग्रामीण फीडर पर ओवरलोड और बिजली चोरी का रोना रोता है। पर सवाल ये है कि चोरी रोकना किसका काम है? अगर लाइन लॉस है तो उसके लिए ईमानदार उपभोक्ता को सजा क्यों?
विभागीय उदासीनता भी प्रमुख कारण है। शहर में फाल्ट होने पर 30 मिनट में टीम पहुंचती है। गांव में शिकायत करो तो 3 दिन तक कोई सुनने वाला नहीं। टोल फ्री नंबर 1912 सिर्फ रिंग बजाता है।
सरकार को तुरंत इस सौतेले व्यवहार को खत्म करना होगा। कृषि फीडर को अलग करो और दिन - रात्रि में विद्युत किसान को रोस्टर के हिसाब से निर्बाध बिना कटौती, अच्छी वोल्टेज वाली बिजली दी जाए ताकि वह सुरक्षित सिंचाई कर सके और ग्रामीण उपभोक्ता रात्रि में चैन की नींद। सो सके।
यह ध्यान देने योग्य बढ़त यदि भी होगी कि रोस्टर का अक्षरशः पालन हो।जो रोस्टर तय है, उसका कड़ाई से पालन हो और उसकी जानकारी हर सब-स्टेशन के बाहर चस्पा की जाए एवं ट्रांसफार्मर की क्षमता बढ़ाएं और हर गांव में ओवरलोड ट्रांसफार्मर तुरंत बदले जाएं और जर्जर तारों को बदला जाए। विभागीय जवाबदेही तय हो।जिस फीडर पर सबसे ज्यादा कटौती होगी, वहां के अवर अभियंता और अधिशासी अभियंता की जिम्मेदारी तय की जाए।
अंत में यही कहेंगे - भारत गांवों में बसता है, यह सिर्फ नारे में नहीं, नीति में भी दिखना चाहिए। अगर गांव अंधेरे में रहेगा तो देश कभी उजाले में नहीं आ सकता। शहरों को जगमग रखने के लिए गांव की बलि देना बंद होनी चाहिए। अन्नदाता की आह मत लो, नहीं तो सत्ता की कुर्सी भी अंधेरे में डूब सकती है। बिजली सिर्फ सुविधा नहीं, किसान का हक है।
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