परिषदीय विद्यालयों में अनुदेशक व शिक्षामित्रो का किया जा रहा आर्थिक शोषण
नीलम ब्यूरो दैनिक अक्षय मेल समाचारपत्र रायबरेली
बछरावां/ रायबरेली। भाजपा सरकार की तानाशाही से सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकार द्वारा नियुक्त अनुदेशक व शिक्षामित्र महामारी के दौर में अल्प मानदेय में गुजारा करने को मजबूर हैं। जहां एक तरफ एक ही परिसर में पूर्णकालिक शिक्षकों को भारी वेतनमान देकर लाभान्वित किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ अंशकालिक अनुदेशको व शिक्षामित्रों से पूर्णकालिक शिक्षक का कार्य लेकर उनको भुखमरी के कगार पर पहुंचाया जा रहा है। सबका साथ सबका विकास का नारा लेकर सत्ता में आई भाजपा सरकार शायद अपने मुख्य मुद्दे से ही भटक गई है। वर्तमान समय में अनुदेशकों व शिक्षामित्रों से से एक दिहाड़ी मजदूर की तरह सब तरह के कार्य लेकर केवल शोषण करने का कार्य प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। सबसे मजेदार तो बात यह है कि नरेगा मजदूरों से भी बदतर हालात में अधिक समय कार्य लेकर भी अनुदेशकों को स्वयं की सत्तासीन सरकार द्वारा निर्धारित 17000 मानदेय नहीं दिया जा रहा है। आलम तो यह है कि पूर्व की सरकार द्वारा 8470 जो मानदेय बढ़ाया गया था। उसकी भी सत्ता के नशे में चूर सरकार द्वारा कटौती कर ली गई और पहले दिए मानदेय की रिकवरी भी की गई। हाई कोर्ट द्वारा 17000 का मानदेय दिए जाने के आदेश को भी धता बताते हुए मनमानी पर सत्तासीन सरकार आमादा है। महामारी के दौर में जहां एक तरफ आम जनमानस को महामारी से बचाने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करके मास्क लगाकर सजग रहने के लिए सरकार लगातार जागरूक कर रही है, वहीं दूसरी तरफ शिक्षक, अनुदेशक व शिक्षामित्र कोरोना काल में लगातार विद्यालय आ रहे हैं। यह भी शहरों से आकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी महामारी के संचार का साधन बनेंगे। महामारी काल में सत्तासीन सरकार द्वारा जरनल डायर की तरह क्रूर आदेश जारी करके विद्यालय समयावधि में भी बढ़ोतरी की गई है। इस संबंध में अनुदेशक संघ के जिला अध्यक्ष हिमांशु वर्मा से जब संवाददाता ने बात की तो उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2017 में ही अनुदेशकों के मानदेय को 7000 से बढ़ाकर 17000 कर दिया गया था। फिर भी सरकार द्वारा मनमाना रवैया अपनाते हुए बढ़ा हुआ मानदेय अनुदेशकों को नहीं दिया गया। इस संबंध में जब संगठन ने उच्च न्यायालय का रुख किया तो जीविका से जुड़ा हुआ मामला होने के कारण हाईकोर्ट ने तुरंत संज्ञान में लिया और सरकार से मार्च 2017 से ही 9% ब्याज के साथ मानदेय का भुगतान करने का आदेश भी जारी किया लेकिन सत्ता के नशे में चूर सरकार न्यायालय के आदेश को भी मानने को नहीं तैयार है। वही पूर्व में मानदेय में की गई कटौती व मानदेय ना बढ़ाने को लेकर अनुदेशकों में आक्रोश भी व्याप्त है।

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