महान वीरांगना झलकारी बाई कोरी का फिजिकलल डिस्टेंसिंग के बीच 162 वां शहादत दिवस सादगी पूर्ण ढंग से मनाया गया।



नीलम
दैनिक अक्षय मेल समाचार पत्र

1857 के स्वतंत्रता आंदोलन की महान #

वीरांगना_झलकारी_बाई का फिजिकलल डिस्टेंसिंग के बीच 162 वां शहादत दिवस सादगी पूर्ण ढंग से मनाया गया।
         10 मई 1857 को मेरठ छावनी से प्रारंभ हुआ प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन जब 4 जून 1857 को झांसी  पहुंचा तो उसका नेतृत्व झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किया। उन्ही की सेना में दुर्गा दल का नेतृत्व वीरांगना झलकारी बाई ने किया।  झलकारी बाई का जन्म झांसी से 4 कोस दूर भोजला गांव में अनुसूचित जाति की एक उपजाति कोरी/ कोली में हुआ था। झलकारी बाई के बचपन का नाम झलरिया था । इनके पिता जी का नाम सिद्धू उर्फ सदोवा तथा माता का नाम लहकारी बाई उर्फ यमुना देवी था । झलकारी बाई का विवाह पूरन कोरी से हुआ था । इनका रंग रूप आकार प्रकार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, इसलिए लोग भ्रम में पड़ जाते थे कि असली रानी कौन है । 
       जब अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण किया तो झलकारी बाई ने  जाति धर्म से ऊपर उठकर  अपने पति पूरन कोरी के साथ  देश की आन बान शान के लिए अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं ।
        झलकारी बाई  ने जब देखा  कि झांसी चारों तरफ से अंग्रेजों से घिर गई है  तो उन्होंने एक योजना के तहत झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को  अपने कपड़े पहनाकर झांसी  के किले से बाहर निकाल दिया  और स्वयं  रानी लक्ष्मीबाई के कपड़े पहन कर  रानी लक्ष्मीबाई बनकर  अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए  5 अप्रैल 1858 को  ग्वालियर के निकट  शहीद हो गई थीं।  उन्होंने शपथ लिया था कि जब तक मैं  झांसी को अंग्रेजों से  मुक्त नहीं करा दूंगी  तब तक अपने माथे पर सिंदूर नही लगाऊंगीं।  मैथिलीशरण गुप्त ने भी  उनके शौर्य की प्रशंसा करते हुए  लिखा है कि  *"खूब लड़ी मर्दानी वह तो  झांसी  की झलकारी  थी ।"*
       5 अप्रैल 2020 को रायबरेली के सारस होटल स्थित झलकारी बाई चौक पर लगी वीरांगना झलकारी बाई की आदम कद प्रतिमा पर उनके अनुयायियों ने सुबह #फिजिकल_डिस्टेंसिंग* का ध्यान रखते हुए माला फूल चढ़ाया। अगरबत्ती मोमबत्ती जलाकर उन्हे  नमन वन्दन किया ।

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