तीन सालों से आवास के लिए दर-दर भटक रहा बुजुर्ग नहीं मिला आवास


3 सालों से आवास के लिए दर-दर भटक रहा बुजुर्ग नहीं मिला आवास

अक्षय मेल समाचार

हरचंदपुर रायबरेली राज्यपाल मुख्यमंत्री से लेकर जिले के आला अधिकारियों की चौखट पर शिकायत दर्ज कराने वाले असहाय आवास विहीन को प्रधानमंत्री आवास मायस्सर  नहीं हो सका खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की पन्नी लगाकर पीड़ित विगत 3 साल से आवास के लिए प्रशासन से धन आवंटन की राह ताक रहा हैं क्या यह प्रदेश की योगी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार का सबका साथ सबका विकास की नीति व नियत की पोल पर पर्दा डालने की कोशिश है
देश व प्रदेश की भाजपा सरकार जहां भ्रष्टाचार पर नकेल कसते हुए बड़े कारोबारी उद्योगपति मंत्रियों व प्रशासनिक अधिकारियों पर शिकंजा कसके उन पर रिपोर्ट दर्ज कर जेल की सलाखों के पीछे भेजने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही वही एक असहाय आश्रय विहीन 70 वर्षीय वृद्ध संतु पुत्र गंगादीन निवासी रूप खेड़ा मजरे हिडईन ब्लाक हरचंदपुर रायबरेली ने वर्ष 2017 मे आवास के लिए गुहार लगाई थी आश्रय विहीन को गणेश परिक्रमा का आलम यह हुआ कि जब जिला प्रशासन से सुनवाई नहीं हुई तो उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व राज्यपाल राम नाइक के दरबार में वर्ष 2018 में पहुंचकर गुहार लगाई थी प्रदेश के राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार सुरेश राणा ने जरूर वृद्ध की मदद करते हुए जिलाधिकारी रायबरेली को पत्रांक प्रेषित कर कार्रवाई कर आवास दिलवाए जाने की बात पर जिला प्रशासन द्वारा 17 अगस्त 2018 को चयन सूची में पात्रता दर्शाते हुए नाम अंकित कर दिया था लेकिन खंड विकास कार्यालय पर विगत 1 साल से इस प्रधानमंत्री आवास बनवाने के धन का आवंटन ही नहीं हुआ जब भी पीड़ित खंड विकास कार्यालय पर जाकर बीडीओ व ग्राम प्रधान से आवास बनवाने की गुहार लगाता है तो दोनों ही चुप्पी साध जाते हैं आखिर कहीं न कहीं इस धन आवंटन में भ्रष्टाचार व साजिश की बू आती है आश्रय विहीन वृद्ध को अपने परिवार को खुले आसमान में पन्नी लगाकर कब तक जीवन यापन करना पड़ेगा यह जिला प्रशासन से लेकर खंड विकास के अधिकारियों के लिए सोचने पर मजबूर करेगा उक्त प्रकरण पर जब संवाददाता ने जिला विकास अधिकारी डीपीआरओ तथा बीडीओ  से फोन पर पक्ष जानना चाहा तो किसी ने फोन ही नहीं उठाया ऐसी स्थिति में गरीब बेचारा आवास के लिए प्रशासनिक शोषण से उपेक्षित होने पर आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं बचता?

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