अक्षय मेल समाचार
मुसाफिरखाना ,अमेठी : कर्बला में अपनी अजीम कुर्बानी पेश करके सम्पूर्ण मानव जाति के स्वाभिमान, इन्सानियत और मानवता के वजूद को हमेशा-हमेशा के लिए महफूज करने वाले हज़रत इमाम हुसैन की याद में दसवीं मोहर्रम के अवसर पर मंगलवार को मुसाफिरखाना के भनौली गाँव में जुल्जनाह (दुलदुल) और अलम का जूलूस निकालकर कर्बला में सैकड़ों ताजिए दफ्न किये गये। जहां हाय हुसैन की सदाओं के साथ आंखें नम हो रही थीं। दसवीं मोहर्रम को यौम-ए-आशूरा कहा जाता है और 1400 वर्ष पहले इसी दिन कर्बला के मैदान में यजीद नामक क्रूर व्यक्ति ने नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन को शहीद करवा दिया था। दुनियाभर में शिया समुदाय के लोग मोहर्रम में गम में डूबे रहते हैं।
भनौली के बड़े इमामबाड़े में सुबह 10 बजे मजलिस के बाद जुलूस का सिलसिला शुरू हुआ। ये जुलूस बड़े इमामबाड़े से निकलकर जामा मस्जिद इमामबाग गया। जहां नमाज़ के बाद ये फिर से बड़े इमाम बारगाह वापस लौटा और नौजवानों ने यहां ज़ंजीरज़नी की। इसके बाद जुलूस छोटे इमामबाड़े व दरगाह-ए-आलिया होते हुए कर्बला पहुंचा, जहां ताजिया दफ्न की गई। इससे पहले सुबह अज़ादारो ने आमाल-ए-आशूरा किया। इमाम की शहादत के गम में डूबे अज़ादारो ने आशूर के दिन भूखे-प्यासे रहकर शहजादी फतेमा को आंसुओं का पुरसा पेश किया। बता दें, शाम चार बजे जगह-जगह फाका शिकनी का आयोजन किया गया, जहां अज़ादारो ने अपना फाका खोला। जुलूस के दौरान प्रशासन पूरी तरह से सक्रिय रहा।

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