शिक्षा विभाग की गिरती साख और शिक्षक तैनाती में फर्जीवाड़े तथा अवैध संचालित हो रहे विद्यालयों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही ना होना

संपादक की कलम से:-

शिक्षा विभाग की गिरती साख और शिक्षक तैनाती में फर्जीवाड़े। अवैध संचालित हो रहे विद्यालयों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही ना होना।
   अमेठी,उत्तर प्रदेश:-  एक समय था जब गाँव गाँव प्राइमरी स्कूल नहीं थे और बच्चों को पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता था।लेकिन उस समय शैक्षिक स्तर ही ठीक नही था बल्कि गुरु शिष्य परम्परा कायम थी और बच्चे गुरू जी का सम्मान अपने माता पिता से अधिक करते थे।इन्हीं सरकारी स्कूलों के पढ़ें बच्चे ही बड़े बड़े औहदों पर पहुचंते थे और उस जमाने का चहरूम पास आज के इंटर बीए से अधिक ज्ञानवान होते थे।उस समय लोग शिक्षक पैसे के लिये नहीं बल्कि समाजिक मान सम्मान एवं बड़प्पन के लिये शिक्षक नही गुरू जी मुंशी जी बनने के लिए शिक्षा जगत में आते थे। लेकिन आज के दौर में शिक्षक की परिभाषा बदल गयी है और गुरु जी अब शिक्षक, टीचर, सरजी बन गये हैं।उनकी भारतीय शिक्षक की भेषभूषा बदल गयी है।अब मुंशी जी पायजामे और गुरू जी भारतीय परिधान धोती कुर्ता सदरी पहनकर नहीं बल्कि शुटबूट में साहब बनकर आ रहे हैं।कभी पूरा समाज एक जैसा नही होता है और हर जगह लोग दोहरी सोच के होते हैं।आज भी हमारे तमाम शिक्षक ऐसे हैं जो बच्चों के साथ गुरू की भूमिका अदा करके शिष्य को शिखर तक पहुंचा रहें हैं।आज शिक्षक की मोटी तनख्वाह और मस्त जिंदगी को देखकर इसमें गुरु जी मुंशी टीचर सर के साथ गंवार फर्जी डिग्री वालों का समावेश होने लगा है।अब शिक्षक का लबादा ओढ़कर अशिक्षक लोगों का समय आ गया है।अबतक कितने अयोग्य फर्जी डिग्री के सहारे शिक्षा विभाग में घुस गये हैं इसका अनुमान लगा पाना कठिन है।अभी दो दिन पहले सिर्फ गोंडा में फर्जीवाड़ा करके शिक्षक बनने वाले पन्द्रह रंगे सियारों को बर्खास्त किया गया है। इसका भंडाफोड़ भी नहीं होता यदि कट आफ मेरिट से बाहर हुये शिक्षक पद के अभ्यर्थियों ने शिकायत नहीं की होती।गोंडा तो एक नमूना बनकर सामने आया है।
इसी तरह अभी पिछले दिनों फर्जीवाड़ा का भंडाफोड़ हो चुका है।किस तरह लोग टापर बनते हैं इसका भी भंडाफोड़ हो चुका है।अभी जिन शिक्षा मित्रों को शिक्षक से पुनः शिक्षा मित्र बनाया गया है वह इन फर्जीवाड़े के शिक्षकों से बेहतर हैं।गुरू जी बनना आसान नहीं होता है और उसके लिए त्याग एवं नेक चलन इंसान बनना पड़ता है।आज के कुछ युवा शिक्षक गुरूता का प्रदर्शन नहीं बल्कि अपनी कामुकता एवं आधुनिकता का प्रदर्शन करते हैं।शिक्षक या गुरू समाज के भविष्य का निर्माता ही नहीं बल्कि समाज का दर्पण होता है।दो दिन पहले सिर्फ एक चयन समिति की आंखों में धूल झोंक कर शिक्षक बने पन्द्रह लोगों को बर्खास्त किया गया है।यह तो इत्फाक है कि कट मेरिट से बाहर होने वालों ने इसकी शिकायत कर दी।इस तरह से फर्जी डिग्री और फर्जीवाड़े से कितने लोग गुरू जी बने शिक्षा विभाग को कंलकित कर रहें होगें इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है।शिक्षा जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार शैक्षिक वातावरण को प्रदूषित और बदनाम कर रहा है।जीवन में जिसे जो भूमिका ईश्वर की कृपा से मिली है उसे बखूबी अदा करना हर किसी का धर्म बनता है।समाज और सरकार के विभिन्न पदों पर आसीन करने लायक शिक्षक ही होता है।इसलिये शिक्षा और शिक्षक दोनों का मूल स्वरूप भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होना आवश्यक है।आज हमारे तमाम शिक्षक उतनी ही तनख्वाह में अपनी कर्तव्यपरायणता के बल पर शिखर से पहुंच कर छोटे स्तर से लेकर राष्ट्रपति स्तर तक सम्मानित होते हैं।तमाम सरकारी प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय अपने अपने शिक्षा क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किये हुए हैं।इनके बच्चे भी लगता है कि स्कूल में ज्ञान ग्रहण करने जाते हैं।शिक्षा विभाग को फर्जीवाड़ा की व्यापक आशंका को दूर करने के लिये अबतक  चयनित लोगों द्वारा प्रस्तुत किये गये अभिलेखों का परीक्षण कराना जरूरी सा हो गया है।यह बात जगजाहिर हो गयीं हैं कि शिक्षा जगत में फर्जीवाड़ा करके लोग प्रवेश हो रहें हैं।आज सरकार शिक्षा के नाम पर पानी की तरह पैसे उड़ा रही है और गाँव गाँव स्कूल खोल रही है।बच्चों के घर जाकर उनके अभिभावकों को प्रेरित ही नहीं किया जाता है बल्कि खाना कपड़ा बस्ता किताब सब मुफ्त में दिया जाता है।इस सब के बावजूद लोग इन सरकारी स्कूलों में अपने भविष्य का दाखिला नहीं कराते हैं।बिना योग्यता के शिक्षक अप्रशिक्षित ड्राइवर की तरह होता है जो अपने साथ सवारियों को भी लेकर डूब जाता है। वहीं दूसरी तरफ जनपद ही नहीं पूरे प्रदेश में प्राइवेट नर्सरी स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों एवं प्रशासन की मिलीभगत से फल फूल रहे हैं जिसमें प्रायः देखा गया है कि अप्रशिक्षित अध्यापक ही बच्चों को शिक्षा देते हैं। योगी सरकार बनने के बाद यह देखने को मिला था कि सरकारी अधिकारियों एवं प्रशासन प्राइवेट अवैध रूप से चल रहे विद्यालयों को चिन्हित करने में लगा हुआ था चिन्हित ही नहीं बल्कि लगभग सभी अवैध रूप से चल रहे विद्यालयों के प्रबंधकों और प्रधानाचार्य को प्रशासन की तरफ से नोटिस जारी की गई थी एक तय सीमा के अंदर  मान्यता ले लें अन्यथा अपने स्कूल बंद कर दें लेकिन समय बीतने के साथ यह प्रवर्तन देखने को मिला कि विद्यालय तो नहीं बंद हुए लेकिन प्रबंधकों ने विद्यालयों के संचालन का समय  बदल दिया जाता है । यह  इस तरह का स्कूल प्रबंधकों और प्रशासन तंत्र की मिलीभगत से विद्यालयों का समय परिवर्तन करना और प्रशासन द्वारा प्रबंधकों के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करने के पीछे सेटिंग गेटिंग का मामला या सत्ता पक्ष के रसूखदार का भी दबाव माना जा सकता है वास्तव में हो कुछ भी लेकिन यह व्यवस्था वास्तव में सरकारी विद्यालयों को गर्त में ले जाने की एक अहम भूमिका निभाएगा । प्रश्न यहां यह उठता है कि आख़िर यह प्राइवेट अवैध रूप से चल रहे स्कूल क्या वास्तव में बंद हो पाएंगे क्या वास्तव में प्राथमिक विद्यालयों की दशा सुधरेगी। अभिभावकों की प्राथमिक विद्यालयों और अध्यापकों  के प्रति सोच बदलेगी शायद कर्मचारियों और अवैध रुप से संचालित कर रहे विद्यालयों के प्रबंधकों के बीच जब तक इस सात गांठ को प्रशासनिक स्तर से नहीं तोड़ा जाएगा कोई प्रभावी कार्यवाही की जाएगी ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता है कि प्राथमिक विद्यालय की दशा और दिशा में सुधार हो सके।

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