संपादकीय।
एससी/एसटी/ओबीसी आरक्षण और संवैधानिक व्यवस्था सामाजिक न्याय की आधारशिला ।
मंदिर के दरवाजे पर अटका सामाजिक न्याय, आरक्षण क्यों आज भी जरूरी ।
हरि प्रसाद यादव।
भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। संविधान निर्माताओं ने माना कि सदियों से वंचित वर्गों को बराबरी पर लाने के लिए समान अवसर ही पर्याप्त नहीं, विशेष अवसर देना आवश्यक है।अनुच्छेद 15(4) और 15(5) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, SC/ST के लिए विशेष उपबंध करने का अधिकार देता है।अनुच्छेद 16(4) और 16(4A)(4B)सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान।अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन।अनुच्छेद 46 SC/ST और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।अनुच्छेद 330, 332, 334 लोकसभा और विधानसभा में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण।103वां संशोधन:EWS (आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग) को 10% आरक्षण।
मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद केंद्र में OBC को 27%, SC को 15% और ST को 7.5% आरक्षण दिया गया। राज्यों में यह अनुपात जनसंख्या के अनुसार अलग-अलग है। सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी केस में आरक्षण की सीमा 50% तय की थी, जिसे अब EWS को मिलाकर कई राज्यों में पार किया जा रहा है।आरक्षण समर्थकों का तर्क है कि यह प्रतिनिधित्व और गरिमा का प्रश्न है। जब तक समाज में भेदभाव और अवसरों की असमानता है, आरक्षण सामाजिक न्याय का सबसे सशक्त उपकरण है। इसने लाखों लोगों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है। वहीं, आलोचकों का मानना है कि आरक्षण का लाभ अब कुछ परिवारों तक ही सीमित हो गया है, और इसका आधार आर्थिक होना चाहिए। वे क्रीमी लेयर की अवधारणा को और सख्त करने तथा शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर देने की बात करते हैं।
जातीय भेदभाव का इससे नायाब नमूना क्या हो सकता है कि विधायक के ही प्रयास पर पर्यटन विभाग ने लखनऊ के काकोरी स्थित शीतला माता मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए 76 लाख रुपये मंजूर किए थे।19-20 अगस्त 2026 को उसी के शिलान्यास और भूमि पूजन कार्यक्रम में मलीहाबाद विधायक जय देवी कौशल जी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था।विधायक का आरोप है कि पूजा के दौरान उन्हें खड़ा रखा गया और उचित सम्मान नहीं दिया गया। उन्हें अगरबत्ती, नारियल चढ़ाने और आरती में शामिल होने से रोका गया।पूजा पुजारी शैलेंद्र बाजपेई करा रहे थे। विधायक के बेटे विकास किशोर ने सोशल मीडिया पर इसे जातिगत भेदभाव बताया। विधायक जय देवी कौशल को मंदिर में पूजा करने से रोक देना और सवर्णों द्वारा पूजा स्थल से भगा देना, कोई सामान्य घटना नहीं है। यह घटना 2026 के भारत का वह कड़वा सच है जो बताता है कि हमने आर्थिक तरक्की भले ही कर ली हो, लेकिन मानसिकता में अभी भी हम सदियों पीछे खड़े हैं। जब एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि, जिसके पीछे हजारों वोटों की ताकत है, सिर्फ उसकी जाति के कारण मंदिर में अपमानित होता है, तो सोचिए एक आम दलित, पिछड़े वर्ग के व्यक्ति के साथ रोज क्या होता होगा।
यही वह कारण है जिसके लिए बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की थी।
संविधान में आरक्षण गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है। यह सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व की गारंटी है। संविधान का अनुच्छेद 15(4) कहता है कि राज्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए विशेष व्यवस्था करेगा। अनुच्छेद 16(4) नौकरियों में, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को खत्म करता है और अनुच्छेद 46 राज्य को आदेश देता है कि वह कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करे। आरक्षण का उद्देश्य किसी को दया के रूप में नौकरी देना नहीं, बल्कि उस सत्ता और व्यवस्था में हिस्सेदारी देना है जहाँ से उसे हजारों साल तक बाहर रखा गया।
मलीहाबाद की घटना ने इस संवैधानिक व्यवस्था के मूल पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि अगर मंदिर में भगवान के सामने भी बराबरी नहीं है, तो क्या सिर्फ आर्थिक आधार पर बराबरी आ सकती है?
आज कुछ लोग कहते हैं कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, जाति के आधार पर नहीं। यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है, पर जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। मलीहाबाद में विधायक को उसकी गरीबी के कारण नहीं, उसकी जाति के कारण भगाया गया। देश में SC/ST/OBC के लोगों के साथ मारपीट, घोड़ी पर न चढ़ने देना, मूंछें रखने पर हत्या, मंदिर में प्रवेश न करने देना – ये घटनाएं आर्थिक नहीं, जातिगत मानसिकता की देन हैं। जब भेदभाव जाति के आधार पर है, तो समाधान भी जाति के आधार पर ही पहचान कर करना होगा। आरक्षण ने पहली बार दलित और पिछड़े समाज के लोगों को स्कूल, कॉलेज, सचिवालय, थाना, कचहरी और विधानसभा तक पहुंचाया है। आज यदि एक दलित विधायक मंदिर में अपमान का विरोध कर पा रहा है, तो यह आरक्षण से मिली शिक्षा और राजनीतिक चेतना के कारण ही है। अन्यथा यही समाज पहले चुपचाप अपमान सह लेता था।इसलिए आज आवश्यकता आरक्षण खत्म करने की नहीं, बल्कि उसे और अधिक प्रभावी बनाने की है। आरक्षण का दायरा सिर्फ नौकरियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। निजी क्षेत्र, ठेकेदारी, न्यायपालिका और मीडिया में भी वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए, क्योंकि भेदभाव हर जगह है।मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर भेदभाव करने वालों पर SC/ST एक्ट और अनुच्छेद 17 के तहत कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। पूजा का अधिकार सबका है, भगवान किसी जाति विशेष की जागीर नहीं है।सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए ताकि पता चले कि किस वर्ग की आबादी कितनी है और आरक्षण का लाभ सच में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा या नहीं।
मलीहाबाद की घटना एक चेतावनी है। यह बताती है कि कानून बनने से मानसिकता नहीं बदलती। जब तक एक दलित को मंदिर में, एक पिछड़े को सम्मान में और एक आदिवासी को जल-जंगल-जमीन पर बराबरी का हक नहीं मिलेगा, तब तक संविधान में लिखे सामाजिक न्याय के सपने को पूरा नहीं माना जा सकता। आरक्षण कोई खैरात नहीं, यह उस अपमान की भरपाई है जो सदियों तक इस देश के बहुसंख्यक समाज ने सहा है।
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