21वीं सदी में भी स्वतंत्र नहीं महिलाएं।
महिला प्रतिनिधियों की सार्वजनिक समारोहों और बोर्ड की बैठकों में सहभागिता सुनिश्चित न होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण एवं स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए खतरा।
हरि प्रसाद यादव।
पुरुष प्रधान/पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी समाज में महिलाएं निश्चित रूप से आगामी स्वर्णिम भारत की नींव और मजबूत करने का हर संभव प्रयास कर रहीं हैं, जो सचमुच काबिले तारीफ है। परंतु यह देश में दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 21वीं सदी में भी महिलाएं स्वतंत्र नहीं है, बीते 78वे स्वतंत्रता दिवस पर देखने को मिला कि महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों द्वारा सरकारी/गैरसरकारी संस्थानों में किया गया ध्वजारोहण करने की होड़ सी मची थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने निकल कर आयी कि इन जनप्रतिनिधियों के पतियों को ध्वजारोहण और ध्वज फहराने में अंतर नही पता है। खास बात है कि यह अंतर प्रतिनिधियों के पतियों को ही नही बल्कि जिले के अधिकांश अधिकारियों को भी नही पता है कि ध्वजारोहण और ध्वज फहराने में क्या अंतर है और किस पर्व पर क्या करना चाहिए।
एक सर्वे में पता चला है कि लोकसभा और विधान सभा के बैठकों को छोड़ दिया जाए तो त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था जिसमे ग्राम पंचायत के सदस्य से लेकर ग्राम प्रधान क्षेत्र पंचायत सदस्य ब्लॉक प्रमुख जिला पंचायत सदस्य जिला पंचायत अध्यक्ष तथा नगर पंचायत और नगर पालिका एवं महानगर पालिकाओं में भी महिला प्रतिनिधियों के ऊपर पतियों का ही दब दबा देखने को मिलता है। प्राय किसी भी समारोहों में यहां तक की बोर्ड की बैठकों में भी महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों के द्वारा ही प्रतिभागिता निभाई जाती है जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है जो महिलाओं के राजनैतिक अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। पुरूष प्रधान समाज के संकुचित मानसिकता में बंधे होने के कारण 21वी सदी में भी महिलाएं घर की चारदीवारी में कैद होकर रूढ़िवादी परंपराओं का बोझ ढो रही हैं।
यद्धपि 18वीं शताब्दी में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। महिलाओं को किसी भी प्रकार का कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं था परिवार पितृ सत्तात्मक होते थे । संपत्ति पर अधिकार केवल पुरुषों का होता था । महिलाओं को किसी भी प्रकार की संपत्ति से वंचित रखा जाता था। बाल विवाह का प्रचलन पूरे देश में बहुत जोरों से था, छोटी-छोटी बच्चियों की शादी तब कर दी जाती थी, जब उन्हें पता भी नहीं होता था कि शादी आखिर है क्या?
महिलाएं शिक्षा के अधिकार से पूर्णतया वंचित थी । भारत में महिलाओं की स्थिति लगातार बदलती रही है! समय के साथ साथ उसमें अनेक परिवर्तन आए हैं! पूर्वकाल से लेकर आधुनिक काल तक महिलाओं की दशा में अनेक प्रकार के उतार चढ़ाव आतें रहे हैं! वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी थी, समाज व परिवार में उनका सम्मान किया जाता था! उनको सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त थे, लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे थे जो महिलाओं को नीच नजरों से देखते थे ! लेकिन समय के साथ उनकी स्थिति बदलने लगी जहाँ पहले उनकों देवी का रुप माना जाता था अब केवल भोग विलास की वस्तु समझा जाने लगा था! उनके लिए निंदा भरे शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा उनके अधिकारों का हनन किया जाने लगा!
मुझे यह भी लगता है कि आज औरत पहले से ज्यादा पढ़ी लिखी, कमाऊ, विश्वशनीय, बेहतर गृहणी भी है पर कहीं कहीं देखो तो आज भी गुलामी की जंजीर दिखती है। दूसरी तरफ औरत घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बलात्कार, ऑफिस में अशोभनीय व्यवहार, का शिकार तो आज भी है।
उच्च वर्ग परिवार हो या निम्न वर्ग परिवार हर कोई बस दिखावे के लिए ही साथ हैं, ज्यादातर पुरुष आज अहम, क्रोध, अशांति, लालच, की गिरफत में है।
पुराने जमाने में हमने दादी, नानी को देखा मुझे लगता है, वो आज की औरत से ज्यादा सुखी और संतुष्ट थीं। आज सब कुछ ज्यादा है, पैसा, घर बढ़ा, क़ार, पोस्ट, रुतबा पर फिर भी औरत की स्थिति तो बस कानून की दृष्टि में काफी बदली है, सच्चाई में मुझे शक है।
देखने में ये पुरुष इन्हीं स्त्रियों के द्वारा उत्पन्न होते हैं। औरत बदनसीब नहीं होती जब औरत बच्चे को जन्म देती है वो घर, समाज और इस देश का भविष्य बनाती है और ये मर्द इन औरतों की कोख से जन्म लेते हैं और अपना भविष्य बनाते हैं । नारी माँ है, शक्ति है।
हमारे शास्त्रों में महिलाओं का स्थान बहुत ऊंचा है और आप जानते हैं कि इस समाज में उनका क्या स्थान है।
पुरुष इन स्त्रियों को उपभोग और उपयोग का स्थापत्य मानकर इन स्त्रियों को अपने सामने बहुत तुच्छ समझते हैं, जबकि वे नहीं जानते कि इन पुरुषों को जन्म देने वाली स्त्री नगण्य है जहाँ वह इतनी विकसित है कि ये पुरुष सामने तिरस्कार करते हैं।
महिलाओं के विकास के बिना समाज का विकास संभव नहीं है।
संवैधानिक अधिकार एवं आधार - भारतीय संविधान सभी भारतीय महिलाओं को समान अधिकार है। (अनुच्छेद 14), राज्य द्वारा कोई भेदभाव नही करने (अनुच्छेद 15(1)), अवसर की समानता (अनुच्छेद 16), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39(घ)) की गारंटी देता है। इसके अलावा यह महिलाओं एवं बच्चों के पक्ष में राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाए जाने की अनुमति देता है (अनुच्छेद 15(3), महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का परित्याग करने (अनुच्छेद 15(ए)ई) और साथ ही काम की उचित एवं मानवीय परिस्थितियां सुरक्षित करने, प्रसूति सहायता के लिए राज्य द्वारा प्रावधानों को तैयार करने की अनुमति देता है (अनुच्छेद 42)।
आजाद भारत में सरोजिनी नायडू संयुक्त प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनी। सन् 1951 में डेक्कन एयरवेज की प्रेम माथुर प्रथम भारतीय महिला व्यवसायिक पायलट बनी। सन् 1959 में अन्ना चाण्डी केरल उच्च न्यायलय की पहली महिला जज बनी। सन् 1963 में सुचेता कृपलानी पहली महिला मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) बनी। सन् 1966 में कमलादेवी चट्टोपाध्याय को समुदाय नेतृत्व के लिए रेमन मैग्सेसे अवार्ड दिया गया। सन् 1966 में इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी।
वर्ष 1972 में किरण वेदी भारतीय पुलिस सेवा में भर्ती होने वाली पहली महिला बनी। वर्ष 1979 में मदर टेरेशा नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली पहली महिला थी। साल 1997 में कल्पना चावला पहली महिला अंतरिक्ष यात्री बनी। वर्ष 2007 में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनीं।साल 2009 में मीरा कुमार लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। 2017 में निर्मला सीतारमन पहली पूर्णकालिक महिला रक्षामंत्री बनी। महिलाओं के इतनी ऊंचे वजूद के बावजूद लोकसभा और विधानसभा प्रतिनिधियों के अतिरिक्त अन्य प्रतिनिधियों के अधिकार पर उनके पतियों का काबिज होना लोकतांत्रिक देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।
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