अन्नदाता को नहीं मिल पा रही आवारा पशुओं से निजात गौरक्षा के चक्कर में पशुधन ही किसानों का हो गया दुश्मन

अन्नदाता को नहीं मिल पा रही  आवारा पशुओं से निजात 


गौरक्षा के चक्कर में पशुधन ही किसानों का हो गया दुश्मन


अक्षय मेल।
 बाजार शुक्ल अमेठी। गरीब किसानों को और भी गरीब बनाने में बेसहारा पशुओं की बड़ी भूमिका है। क्षेत्र में 40 फीसद किसान ऐसे हैं जो बटाई पर खेत लेकर अपनी खेती करते हैं। प्रति बीघा उनकी लागत भी अधिक होती है। एक साल मे जोताई, बोआई, बीज और सिचाई आदि का खर्च जोड़कर प्रति बीघा उनका खर्च लगभग 12 से 15 हजार पहुंच जाता है, लेकिन इस अनुपात में उनकी पैदावार बेसहारा पशुओं के चलते ही नहीं हो पाती है। किसान इन पशुओं से निजात पाने के लिए क्या करें, उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। किस-किस पशु से अपनी फसलों को बचाएं, यह बड़ी चुनौती है। गाय या सांड़ तो कम संख्या में छुट्टा होते हैं, लेकिन नीलगाय और जंगली बंदरों से सबसे ज्यादा परेशानी है। ग्रामीण क्षेत्रों के किसान बताते हैं कि यदि एक रात भी किसान अपनी फसलों की रखवाली न करें तो उनका खेत एक ही दिन में चौपट हो जाएगा। पहले कई गांवों में होता था पशुओं का कांजी हाउस विगत दो दशक पहले कुछ गांव में छुट्टा पशुओं को किसान पकड़ कर उसी में बंद कर देते थे इसके बाद संबंधित पशुपालक जब अपने पशुओं को छुड़ाने उस कांजी हाउस पर पहुंचे थे तो उन्हें क्षति का हर्जाना देना होता था इसके बाद उनके पशु वापस मिलते थे इससे सभी के अंदर एक डर बना रहता था वह अपनी पशुओं की देखभाल उचित तरीके से करते थे अब ऐसी व्यवस्था कहीं भी नहीं है गौशाला केंद्र बने हैं। लेकिन इसमें विशेष कर कस्बों में सड़क पर टहलने वाले अधिकांश पशुओं को रखा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों के पशु आज भी पकड़ से बाहर हैं। वही नीलगाय जंगली जानवरों पर तो किसी का भी कोई नियंत्रण नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र में बहुत से मन बढ लोगों के पशु भी किसान को भारी क्षति पहुंचा रहे हैं इसकी शिकायत लोगों ने कई बार प्रशासन से किया लेकिन इस शिकायत को प्रशासन हंसी में उड़ा देता है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ