साहब डॉ अम्बेडकर के द्वारा प्रकाशित प्रथम पाक्षिक *"मूकनायक" के १०० वें वर्ष* पर आज ३१ जनवरी २०२० को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के *सामाजिक विज्ञान संकाय स्थित एच. एन. त्रिपाठी सभागार* में *१२:३०* एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, मुख्य वक्ता व विशिष्ट वक्ताओं तथा सभी सम्मानित अतिथियों ने बाबा साहब की तस्वीर व महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
बुद्ध वंदना के साथ कार्यक्रम की औपचारिक शुरुवात हुई।
स्वागत भाषण एवं विषय प्रस्तावना करते हुए कार्यक्रम के संयोजक प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार ने कहा बाबा साहब के द्वारा 100 साल पूर्व उठाए गए सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक सवाल आज भी हमारे सामने चुनौती बनकर खड़े हैं जिनका समाधान किए बिना हमारा देश आगे नहीं बढ़ सकता है. इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए बाबा साहब के विचार आज भी प्रासंगिक हैं. उन्होंने बताया की बाबा साहब के द्वारा प्रकाशित प्रथम पाक्षिक मूकनायक मुख्य रूप से बहिष्कृत लोगों का पक्षधर था किंतु उसमें समग्र भारतीय समाज का प्रतिबिंब दिखाई देता है. उन्होंने अपने पत्रकारिता के माध्यम से भारत की मूलभूत समस्याओं को समाज के सामने रखने का ना केवल महत्वपूर्ण प्रयास किया अपितु उनके समाधान के उपाय भी सुझाए.
मुख्य अतिथि प्रो दीपक मलिक ने कहा कि बाबा साहब का मूकनायक पत्र बहिष्कृत लोगों पर हो रहे अन्याय को दूर करने उनकी प्रगति के रास्ते तलाशने तथा उनकी दशा पर गंभीरता पूर्वक विचार करने का सशक्त माध्यम था उन्होंने कहा कि हमारे देश को आधुनिक राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के सार्वजनिक जीवन में आने के बाद ही शुरू होती है. हम तब तक एक राष्ट्र के रूप में नहीं खड़े हो सकते जब तक हमारे समाज में जाति भेदभाव, छुआछूत, लैंगिक विषमता, आर्थिक समानता आदि विद्यमान है. प्रोफ़ेसर दीपक मलिक ने कहा आज मूकनायक के 100 वर्ष बीतने के बावजूद भी स्थितियां बदली नहीं है, हम भले ही संविधान की प्रस्तावना चारों तरफ पढ़ी जा रही है लेकिन दूसरी तरफ संविधान पर संकट के बादल भी मंडरा रहे हैं. संविधान एक जीवंत प्रश्न बन गया है, संविधान की रक्षा में ही देश की रक्षा निहित है. उन्होंने कहा कि हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए यदि संविधान को किसी तरह की क्षति पहुंचती है तो यह राष्ट्र की बहुत बड़ी क्षति होगी.
विशिष्ट अतिथि प्रो चौथीराम यादव अपने उद्बोधन में कहा हमारे देश में बाबा साहब के महत्व को और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को कम करके आंका गया है आज बाबा साहब के नाम की माला जपते हुए उनका हिंदू करण करने की कोशिश की जा रही है उन्होंने बाबा साहब को उद्धृत करते हुए कहा कि बाबा साहब मानते थे कि हमारे देश को मिली हुई राजनीतिक आजादी अधूरी है हम सामाजिक मुक्ति और आर्थिक मुक्ति के बिना असली आज़ादी की कल्पना नहीं कर सकते दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिवाद इस देश की शान सारी समस्याओं की जड़ है जातिवाद से मुक्त होकर ही जातिवाद के खात्मे की लड़ाई लड़ी जा सकती है जिसके लिए बाबा साहब प्रतिज्ञाबद्ध थे
विशिष्ट वक्ता एवं साहित्यकार डॉक्टर मुक्ता ने अपने उद्बोधन में कहा की मूकनायक के दौर की परिस्थितियां आज फिर से लौट आई हैं आज का समाज पूंजी और पितृसत्ता की नींव पर खड़ा दिखाई दे रहा है बाबा साहब की भाषा अत्यधिक संपर्क संप्रेषण इन थे उनकी प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रभाव आज की पत्र-पत्रिकाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है बाबा साहब ने उस दौर में बहिष्कृत समाज की आवाज उठाई जब देश का कोई भी समाचार पत्र उनकी समस्याओं को नहीं उठा रहा था बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर देश के बहुसंख्यक और बहिष्कृत समाज के लिए एक अभिभावक थे उनकी भूमिका पिता कि नहीं अपने समाज के प्रति एक माता के रूप में थी उनके स्वराज की अवधारणा में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व जरूरी था जो आज भी नहीं हो सका है. उक्त अवसर पर जवाहर लाल कौल 'व्यग्र' (पूर्व न्यायधीश व साहित्यकार), प्रगतिशील लेखक संघ के डॉ संजय श्रीवास्तव इतिहासकार प्रोफ़ेसर बिंदा परांजपे एवं डॉक्टर सुजाता गौतम ने भी विचार व्यक्त किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. लालचंद प्रसाद (संरक्षक - BHU बहुजन इकाई) ने की. कार्यक्रम का संचालन निलांशी गौतम(प्रभारी, कला संकाय) व विवेकानंद द्वारा किया गया। धन्यवाद जापान शोध छात्र रविंद्र प्रकाश भारती के द्वारा किया गया उक्त अवसर पर प्रो रानी सिंह, डॉ. पी पी सोलंकी, के. एस. माने, डॉ. स्वर्ण सुमन, डॉ. बृजेश अस्थावल, डॉ. प्रमोद बागड़ी, आरके प्रसाद, धर्मराज गौतम, जी.पी. चौधरी, जी.एल. सिंह, रामजी मैनेजर, अरुण प्रकाश, समाजसेवी अजय सिंह, अंजना, पूर्णिमा, सारिका गौतम, पिंकी गुप्ता, राहुल यादव, महेश कुमार, सूर्यमणि, शिवेंद्र मौर्य, चंदन सागर व अन्य सभी गणमान्य व्यक्तियों, शिक्षकों ,छात्र छात्राओं व कर्मचारियों की गरिमामय उपस्थिति रही.
प्रस्तुति-
प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
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