किसानों की दुर्दशा एवं सरकार की कार्य प्रणाली तथा धान खरीद में बिचौलियों की भूमिका।
हरि प्रसाद यादव
भारत को एक कृषि प्रधान देश होने का गौरव प्राप्त है ,देश की उन्नति में किसानों की अहम भूमिका होती है । किसानों के खून पसीने की कमाई से देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है लेकिन सरकारों द्वारा किसानों के हित में बातें तो जरूर की जाती हैं लेकिन धरातल पर कुछ दिखाई नहीं पड़ता है बल्कि किसान परेशान और आर्थिक तंगी से जूझता रहता है।
इनके बारे में किसी कवि ने सही ही लिखा है जो आज चरितार्थ हो रहा है।:-
ये किसान तेरी कुटी राजभवन अनुहार।
एक स्वेद कण हो रहा मोती मोल हजार।।
ऊंचे रब नीचे धरा तापित रहे तन ताप। लिखत बने नहीं हीनता दीन कृषक की हाय।।
हमारे देश में किसान को भगवान कहा जाता है क्योंकि वह धरती पर रहने वाले सभी मनुष्यों ही नहीं बल्कि जीव जन्तुओं तक का पालन हार होता है।किसान की खेती ही एक ऐसी जरिया होती है जिससे सभी प्राणी अपने पेट भरने की व्यवस्था कर लेते हैं। किसान जो सिर्फ अनाज पैदा करता है उसमें फायदा कम नुकसान होने की आशंका अधिक रहती है क्योंकि खेती मेहनत से ज्यादा मौसम पर निर्भर होती है। किसानों के भी तीन चार वर्ग होते हैं जिनमें किसानों के एक वर्ग को खेतिहर मजदूर दूसरे को लघु सीमांत कहते हैं।दो ढाई हेक्टेयर भूमि वाले किसानों को अनाज पैदा करने में अधिक लागत लगानी पड़ती है जबकि बीस बीघा से अधिक भूमि वालों को लागत कम लगानी पड़ती है।अब किसानों का एक वर्ग ऐसा है जो फार्मिंग करता है और व्यवसायिक खेती करता नही बल्कि करवाता है। इस देश में सबसे ज्यादा परेशान वह किसान है जो कम खेती करता है। वह अगर अनाज की खेती नहीं करता है और व्यवसायिक करता है तो उसके बच्चे भूखें रह जाते हैं। किसानों का यहीं वर्ग ऐसा होता है जो दैवी प्रकोप या बीमारी से फसल तबाह होने पर बरबाद जाता है और कभी कभी कर्ज से डूबकर जान दे देता है।किसानों को बिचौलियों सेठ साहूकारों के चंगुल से बचाकर उनके उत्पादन का उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार धान गेहूं आदि की सरकारी खरीद मूल्य निर्धारित करके विभिन्न सरकारी व अर्द्धसरकारी संस्थाओं करवाती है।सरकारी खरीद मूल्य व खुले बाजार के मूल्य में थोड़ा अंतर होता है लेकिन वह अंतर कभी कभी कष्टदायक होने लगता है।सरकार की दूकान यानी खरीद केन्द्र पर धान दूबारा सफाई छनाई होती जबकि खुले बाजार में ऐसा कुछ नहीं होता है। सरकारी केन्द्र पर आप जब चाहे तब अपनी फसल बेंचकर पैसा लेकर अपनी जरूरत नही पूरी कर सकते हैं जबकि खुले बाजार में टोकेन नहीं जारी होते हैं बल्कि तत्काल तौल करके भुगतान दे दिया जाता है।इस बार हो रही धान की खरीद सरकार के तमाम दबाव के बावजूद पारदर्शी भ्रष्टाचार रहित नहीं हो पा रही है। कुछ खरीद एजेंसियों ने बिचौलियों के नाम टोकेन सूची में शामिल कर लिये हैं और उनसे डेढ़ सौ से दो सौ रूपया प्रति कुंटल लिया जा रहा है।सरकारी तौल शुरू हुये एक पखवाड़ा बीत गया है और केन्द्रों पर खरीदे गये धान को रखने की जगह नहीं बची है।खरीदे गये धान को केन्द्र से उठाकर उसकी कुटाई करके सरकार को चावल वापस देने वाली चावल मिलें उठान करने में आनाकानी कर रह रही है।इन मिलर्स का तर्क है कि सरकार जितना वापसी चावल मांग रही है उतना नहीं निकल पा रहा है। सरकार सौ किलो धान में सरसठ किलो चावल मांग रही है जबकि मिलर्स कहते हैं कि इतना दे पाना संभव नही है।दरअसल किसान को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं होता है जो घाटे का सौदा करता हो इसलिए मिलर्स भी एक कुंटल में कम से कम दस पांच प्रतिशत अपनी बचत चाहते हैं।कहीं कहीं पर मिलर्स के खिलाफ जिलाधिकारियों द्वाराअभियान चलाकर बिचौलियों के विरुद्ध कार्यवाही दिखती है। अक्सर यह देखा गया है कि सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार केन्द्र स्तर पर दिखता है जबकि इसकी जड़ें ऊपर तक फैली हैं।भारतीय खाद्य निगम के गोदामों पर जिस तरह से खरीद केन्द्र प्रभारियों से वसूली की जाती है यह जगजाहिर है।जब खरीद केन्द्र प्रभारी को खरीदे गये अनाज को सरकारी गोदाम में जमा करने में पैसे देने पड़ेगे तो वह प्रभारी उसकी वसूली किसानों से नही तो किससे करेगा? अगर किसानों से नही करेगा तो मजबूरी में धंधागीरों का अनाज किसान के नाम पर लेना पड़ेगा ।सभी खरीद एजेंसियां या केन्द्र प्रभारी एक जैसे नही होते हैं लेकिन व्यवस्था तो सबको करनी पड़ती है। जब व्यवस्था करनी मजबूरी है तो उसमें अपनी भी कमाई होना जरूरी है।सरकारी खरीद से जहाँ पर किसान अन्य केन्द्रों की अपेक्षा अधिक विश्वास करते हैं वहाँ पर आगामी जनवरी फरवरी तक के टोकेन जारी हो चुके हैं।इस समय किसान को रबी की बुआई करने के लिये पलेवा से लेकर जुताई बुआई खाद दवा हर चींज के लिये पैसे की जरूरत पड़ती है जिसके पास किसानी के अलावा कोई जरिया नहीं होता है उसके पास आमदनी का जरिया सिर्फ अनाज होता है।इस समय किसान को तत्काल धान बेंचकर पैसे की जरूरत है लेकिन धान खरीद केन्द्रों पर उसके समय पर तौल नहीं हो पा रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी धान क्रय केंद्रों पर छापेमारी कर पूरे प्रदेश में सरकार द्वारा अभियान चलाया जाएगा ? क्या इन बिचौलियों और साहूकारों द्वारा फैलाए गए भ्रष्टाचार से किसानों को मुक्ति मिलेगी? क्या किसानों को उनका उचित मूल्य पर मिलने की व्यवस्था सरकार करेगी या फिर हमेशा की तरह किसान अपनी दुर्दशा पर आंसू ही वह आएगा।
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