साम्प्रदायिक सदभाव की मिशाल है बाबा शाहमल की मजार
मुस्लिम ही नही बल्कि हिन्दू धर्म के लोग भी टेकते है मत्था, लोगो की मनचाही मुरादे होती है पूरी
गुरुवार को होगा बाबा का सालाना उर्स व मेला।
अक्षय मेल समाचार
अमेठी
जिला मुख्यालय से महज 10 किमी शाहगढ़ कस्बे में सिथति बाबा शाहमल शाह की मजार सदा से हिन्दू मुस्लिम समुदाय के लोगो के लिए साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल रही है। जहाँ दोनों समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के बाबा पर समर्पित रहते हुए उनके कार्यक्रमो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है। जिसके उपलक्ष्य में बाबा की मजार पर वार्षिक मेला व कौवाली का आयोजन किया जाता है। जिसमे दूर दराज के काफी संख्या में लोग आते है। बाबा का मेला इस वर्ष 26 अक्टूबर को गुरुवार को है। जिसकी तैयारियां जोरों से चल रही है। शाहगढ़ के संस्थापक माने जाने वाले बाबा शाहमल शाह के प्रति दोनों सम्प्रदायो के प्रति विशेष आस्था है। लोगो का विस्वास है कि बाबा के दरबार मे आकर मत्था टेकने वालो व मनौती मांगने वाले कभी खाली हाथ वापस नही जाते। उनकी मन मांगी मुरादे पूरी होती है। क्षेत्रीय जनता के आराध्य बाबा है ही दूर दराज के लोग भी उनके दरबार मे हाजिरी लगाकर मन्नत मागते है, जो पूरी हो जाने पर बाबा के मजार पर मन माफिक चढ़ावा चढ़ाते है। बाबा शाहमल के जीवन के सम्बंध में क्षेत्रीय जनता में तरह तरह की किवदन्तियां प्रचलित है। अधिकांशतः लोगो का मानना है कि बाबा शाहमल शाह ही शाहगढ़ के संस्थापक थे। यहाँ उनका राज्य था। जिसके वो राजा थे। बाद में इन्हें बैराग्य सुझा, राजपाट सब छोड़कर सन्त जीवन मे तल्लीन होकर जनता की सेवा करने लगे। रोगियों का निःशुल्क इलाज भी करते थे। कुछ लोग इन्हें हिन्दू मानते है तो कोई मुस्लिम मानता है। कुछ लोगो का कहना है बाबा मूलतः हिन्दू थे बाद में मुसलमान हो गए। जो सूफी मत के अनुनायी थे। सूफी संत थे। बाबा का जनता के बीच अच्छा प्रभाव था।वे सिद्ध पुरुष थे। जनता को बहुत चाहते थे। इनके मुह से निकली हर दुआ बद्दुआ कभी खाली नही जाती थी।
एक जनश्रुति है कि एक बार बाबा के आश्रम में मांस पक रहा था। जिसकी शिकायत किसी ने राजा से कर दी। जिस पर तालुकेदार आश्रम गए पैर से डेग का ढक्कन हटाते हुए कहा कि इसमें क्या पक रहा है। बाबा ने जबाब दिया की दाल है। जो देखने पर वही मिली। बाबा तालुकेदार के इस कृत्य से बेहद नाराज व दुखी होकर श्राप दे दिए कि जाओ तुम्हारे कुल में कोई पुरुष उत्तराधिकारी नही होगा।
कालांतर में बाबा का यह श्राप सही सिद्ध हुआ। राजा के दो पुत्र थे। जो असमय काल के गाल में समा गए। एक किवदंती के अनुसार शाहगढ़ कोट के निर्माण के समय एक तरफ की दीवार नही बन पा रही थी। दिन में निर्माण होता तो रात में दीवार गिर जाती। ऐसा कई बार हुआ। राजा ने ज्योतिषियों से सलाह ली तो उन्होंने बताया कि कोट बलि मांग रहा है। तदनुसार बाबा शाहमल ही बलि का बकरा बने। कोट के अंदर बने बाबा की मूल मजार भी यही कुछ संकेत देती है। यहाँ पर बाबा की दो मजारे है। एक कोट के अंदर एक कोट के बाहर। कहा है कि कोट के उत्तराधिकारी बाबा के श्रद्धालु जो दर्शनार्थ करने व मन्नत माँगने को अंदर जाया करते थे। जिसकी काफी संख्या में भीड़ रहती थी के आवाजाही पर रोक लगा दी गयी। और मजार के अंदर जाने वाले दरवाजा ही बन्द कर दिया।
राजघराने के इस कृत्य से राजा पर तरह तरह की मुसीबतें आने लगी। एक दिन रानी को बाबा ने सपने में दर्शन दिया। जिस पर राज परिवार पर चले आ रहे मुसीबतो का हल पूछा जिस पर बाबा ने कहा कि जनता की जो श्रद्धा मेरे प्रति है उसे रोक नही सकती। इसलिए मेरी मजार से कुछ ईंटे निकालकर कोट के बाहर दूसरी मजार बनवा दे। जिससे श्रद्धालु बेरोकटोक हमारी मजार पर आ जा सके । कुछ दिनों बाद कोट के बाहर बाबा की दूसरी मजार बना दी गयी। बाबा की मूल मजार वर्ष में सिर्फ एक दिन ही बाबा के उर्स के समय ही खुलती है। जहाँ अब सभी लोग आते जाते है। हर गुरुवार को बाबा के भक्तों की भीड़ लगी रहती है।
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