आस्था का केन्द्र बना मां देवी हींगलाज का मन्दिर, बाबा पुरूषोत्तम दास जी के कठिन तपस्या का परिणाम है देवी हींगलाज का दादरा में अवतरण। शारदीय नवरात्रि में उमड़ा श्रद्वालुओं का हूजूम

आस्था का केन्द्र बना मां देवी हींगलाज का मन्दिर, बाबा पुरूषोत्तम दास जी के कठिन तपस्या का परिणाम है देवी हींगलाज का दादरा में अवतरण शारदीय नवरात्रि में उमड़ा श्रद्वालुओं का हूजूम

हरि प्रसाद यादव:-संपादक दैनिक अक्षय मेल।

अमेठी - उत्तर प्रदेश के जनपद सुलतानपुर वर्तमान में अमेठी की तहसील व विकासखण्ड मुसाफिरखाना से उत्तर दिशा में लगभग 5 किमी0 दूर ग्राम दादरा के पश्चिम में मां देवी हींगलाज का मन्दिर सुशोभित है, जो आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यहां चैत्र की नवरात्रि तथा शरदीय नवरात्रि में 9 दिन मेले जैसी भीड़ लगी रहती है और दूर-दूर से श्रद्वालु दर्शन करने को आते है। नवरात्रि शुरू होते ही श्रद्वालुओं की भीड़ लगी है। नवमी तक इसी प्रकार मेलें के रूप में श्रद्वालुओं की भीड़ लगी रहेगी। इस शरदीय नवरत्रि में भारी संख्या में श्रद्वालु पहुचकर माॅ देवी हींगलाज का दर्षन एवं आर्षीवाद प्राप्त कर रहे है। माॅ देवी हींगलाज के दर्षन मात्र से ही समस्त कस्टो से मुक्ति मिल जाती है ऐसी मन्यता है।
मां देवी हींगलाज के मन्दिर की स्थापना के बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि बाबा पुरूषोत्तम दास जी जन कल्याण के लिए ब्लूचिस्तान के लासबे्रसा जिले के ल्यारा के हींगोश नदी पर स्थित हींगजाल के मन्दिर से मां को कठिन तपस्या करके ले आये थे। स्थानीय लोगों के अनुसार बाबा पुरूषोत्तम दास को महान सन्त होने के साथ ही अवधी भाषा के कवि होने को भी गौरव प्राप्त है। इन्होने कई ग्रन्थों की भी रचना की है। लोगों का मानना है कि दादुरपुर वर्तमान में दादरा गांव उस समय महामारी का प्रकोप हमेशा ही बना रहता था। जिसे देख बाबा पुरूषोत्तम दास जी ने ग्रामवासियों को इससे छुट कारा दिलाने के उद्देश्य से दादुरपुर गांव के पूरब में लगभग 1 किमी0 दूर गोमती नदी के किनारे घन घोर जंगल में (इस समय गोमती नदी उस स्थान से 1 किमी0 दूर उत्तर पूर्व दिशा में निजामुद्दीनपुर गांव की सीमा में बह रही है।) अपनी तपोस्थली बना कर तपस्या आरम्भ की। घोर तपस्या के बाद बाबा को आकाशवाणी हुयी कि गांव के पश्चिम में मां हींगलाज को लाकर उनका मन्दिर बनवाया जाय, इससे ग्रामवासियों की रक्षा हो सकेगी। आकशवाणी को सुनकर बाबा पुरूषोत्तम दास जी ने मां देवी हींगलाज का पता लगाया तथा उन्हें लाने के लिए निकल पड़े और देवी जी को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके लाने में कामयाबी हासिल की।
मां देवी हींगलाज जब चलने को तैयार हुयी तो उन्हें उनकी शर्तों के अनुसार बाबा अपने साथ लाने लगे। बाबा पुरूषोत्तम दास जी के वंशज पण्डित गजाधर प्रसाद मिश्र के अनुसार इस प्रकार है:- बाब पुरूषोत्तम दास जी के पिता का नाम क्षेमानन्द था, इनकी जैमिनी पुराण सोलहवीं शताब्दी विक्रम सन् 1501 में प्रकाशित हुयी थी। जिसकी खन्डित पाण्डू लिपि नागरी प्रचाारणी सभा काशी में रखी हुयी है। पुनः सम्वत् 1598 में जैमिनी अश्वमेघ छन्दोबद्य अवधी भाषा में लिखा है। सम्वत् 1620 में इनके द्वारा लवकुशोंपाख्यान लिखा गया जो राम चरित मानस की रचना के पूर्व ही बताते है। श्री मिश्र ने बड़े विश्वास के साथ बताया कि रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी भी यहां आ चुके है। बाबा पुरूषोत्तम दास जी जगन्नाथपुरी से घूम कर काशी आये तथा उन्होंने यहाॅ वेद पुराण, उपनिषद आदि का अध्यन किया उसके बाद बाबा पुरूषोत्तम दास जी ने गुरू से सन्यास की इच्छा जताई । गुरू के आज्ञानुसार वे माता पिता सु अनुमति मांगने आये। माता पिता ने उन्हें सन्यास लेने से मना कर दिया और उनका विवाह कर दिया। मुगल कालीन इतिहास के अनुसार अकबर को जब धर्म सम्बन्धी भ्रान्ति पैदा हो गयी तो उन्होंने फतेपुर सीकरी के इादत खाने में जोधाबाई मल में सभी धर्माे के विद्धाने की सभा किया। जिसमें बाबा भी वहाॅ आये हुए थे। जहाॅ सभी धर्मो के लोगो ने बाबा पुरूषोत्तम दास द्वारा बताई गयी बात की पुष्टि करते हुए माना कि हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म है जिसने विश्व को अपना परिवार माना तब अकबर ने बाबा जी को अपना गुरू मान लिया। कुछ समय बाद पुरूषोत्तम दास जी हींगलाज की यात्रा की वहाॅ पर पहुॅच करके बाबा ने कठिन तपस्या करके देवी हिंगलाज को अपने साथ चलने को तैयार किया। देवी हिंगलाज ने चलने के पूर्व शर्त रखा कि आप आगे आगे मेरे पायलों की आवाज कों सुनते हुए चलेंगे पीछे मुड़कर नही देखेंगे। यदि पीछे मुड़कर देखोगे तो मैं वही रूक जाऊॅगी। चलते चलते इन्हौना के दक्षिण की तरफ बियावान जंगल में बाबा पुरूषोत्तम दास जी को पायलों की आवाज नही सुनाई दी तो वे शर्त को भूल गये और जैसे ही पीछे मुड़कर देखा तो आवाज आयी कि मैं अब यही रहूगीं वह स्थान      
अब वर्तमान में जनपद अमेठी की तहसील तिलोई के विकासखण्ड सिंहपुर स्थित अहोरवा भवानी के नाम से विख्यात है। जहाॅ पर सोमवार व शुक्रवार को श्रद्धालुओं का मेला लगता है। जब बाबा पुरूषोत्तम दास जी ने देखा कि निवास स्थान दादरा अभी काफी दूर है तो पुनः माॅ देवी हिंगलाज के समक्ष तपस्या आरम्भ कर दी।
एक बार फिर पूर्व शर्तानुसार माॅ हींगलाज चलने को राजी हुई तो बाबा पुरूषोत्तम दास जी के गाॅव दादुरपुर वर्तमान में दादरा के नजदीक पश्चिम दिशा में पुनः पायलो की आवाज बन्द हो गई तो वही पर माॅ देवी हींगलाज का मन्दिर बनाया गयष जहाॅ नवरात्रि में भव्य मेला लगता है तथा सोमवार व शुक्रवार को श्रद्धालु मन्दिर पर माता के सामने माथा टेककर मनौती मानते है और पूर्ण होने पर अनुष्ठान करते है । लोगो का मानना है कि सन्त शिरोमणि व अवधी भाषा के आदि कवि बाबा पुरूषोत्तम दास गोलोक वासी होने के पूर्व शाम को दादरा गाॅव से सटी हुई उत्तर दिशा में सगरे के पास अपनी कुटी के सामने अपना खड़ाऊ रखकर अन्दर प्रवेश किए और सुबह खड़ाऊ तो देखने को मिला लेकिन जब दरवाजा खोला गया तो उनका शरीर नही मिला इस सम्बन्ध में पंडित गजाधर मिश्र का कहना है कि बाबा ने समाधि ले ली थी उसी स्थान पर समाधि का निर्माण कर दिया गया है जो वर्तमान में मन्दिर के रूप में तो विद्यमान है लेकिन जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।
यहाॅ पर देश के अति विशिष्ट लोकसभा क्षेत्र अमेठी के सांसद व पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 राजीव गाॅधी एवं उनकी पत्नी सांसद सोनिया गाॅधी एवं वर्तमान में सांसद राहुल गाॅधी तक अपना माथा टेक कर आशीर्वाद ले चुके है । इसके बावजूद किसी भी जनप्रतिनिधि का ध्यान इस पवित्र स्थली की तरफ नही पड़ा है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ