पक्षपात की खबर और निष्पक्ष पत्रकारिता का गिरता स्तर ।

पक्षपात की खबर और निष्पक्ष पत्रकारिता का गिरता स्तर ।
 हरि प्रसाद यादव
लोकतंत्र में मीडिया को "चौथा स्तंभ" कहा जाता है। इसका अर्थ सिर्फ इतना नहीं कि यह सरकार, विधायिका और न्यायपालिका के साथ खड़ा है, बल्कि यह भी है कि यह जनता और सत्ता के बीच सेतु का कार्य करता है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यही सेतु दरक रहा है। जिस पत्रकारिता को कभी "सच बोलने का साहस" कहा जाता था, वह वर्तमान में पक्षपात, सनसनी, प्रायोजित खबरों और एजेंडा-आधारित रिपोर्टिंग की गिरफ्त में है।
वर्तमान परिदृश्य में एक ही घटना को अलग-अलग चैनल, अखबार और पोर्टल बिल्कुल अलग रंग में पेश करते हैं। शीर्षक तय करता है कि पाठक क्या सोचेगा, तस्वीर तय करती है कि किसे खलनायक मानना है और एंकर की टोन तय करती है कि किसकी ताली बजनी है। सोशल मीडिया ने इस समस्या को दस गुना बढ़ा दिया है। यहां खबर आने से पहले उसका निष्कर्ष, थीम और हैशटैग तैयार हो जाते हैं। सच और झूठ के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि आम आदमी के लिए तय करना मुश्किल हो गया है कि किस पर भरोसा किया जाए।

पत्रकारिता का मूल धर्म "तथ्य + संतुलन + संदर्भ" है। लेकिन आज तथ्य को तोड़-मरोड़कर, संतुलन को दरकिनार कर और संदर्भ को गायब कर खबर परोसी जा रही है।
 पत्रकारिता में गिरावट के पीछे एक नहीं, कई कारण हैं।पहला  व्यावसायिक दबाव है। टीआरपी और क्लिक की दौड़ में मीडिया हाउस "ब्रेकिंग" और "एक्सक्लूसिव" के नाम पर आधी-अधूरी खबर चलाने लगे हैं। गहराई से रिपोर्टिंग करने में समय और पैसा लगता है, जबकि 30 सेकंड का डिबेट और भड़काऊ पैनल तुरंत व्यूज दिला देता है। विज्ञापनदाता और कॉरपोरेट घराने भी अप्रत्यक्ष रूप से संपादकीय नीति को प्रभावित करते हैं।
 राजनीतिक और सत्ता का दबाव भी पत्रकारिता को प्रभावित करता है। चुनाव के समय से लेकर नीतिगत मुद्दों तक, मीडिया के एक बड़े हिस्से पर यह आरोप लगता रहा है कि वह किसी दल या विचारधारा का प्रवक्ता बन गया है। सरकारी विज्ञापन, पहुंच और दबाव के चलते कई संपादक आलोचना करने से पहले सौ बार सोचते हैं। पत्रकारों में पेशेवर नैतिकता और प्रशिक्षण की कमी भी इस पर अच्छा खासा प्रभाव डालती है। जब पत्रकारिता "मिशन" से हटकर "प्रोफेशन" बन गई, तो जवाबदेही घटी। फैक्ट-चेकिंग, स्रोतों की पुष्टि और दोनों पक्षों की बात सुनने जैसी बुनियादी बातें भी कई बार भुला दी जाती हैं। पत्रकार खुद सोशल मीडिया पर पक्ष लेते दिखें, तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
पक्षपात पूर्ण खबरों का  जनता और लोकतंत्र पर असर बड़ा असर पड़ता है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनमानस  को हो रहा है। भ्रामक और पक्षपातपूर्ण खबरें समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा रही हैं। एक ही मुद्दे पर दो समुदाय दो अलग-अलग "सच" मानकर चल रहे हैं। अफवाहें तेजी से फैलती हैं और बाद में खंडन कोई नहीं पढ़ता। जब मीडिया ही बंट जाए, तो सार्वजनिक बहस की जगह शोर लेता है। नीति-निर्माण, विकास और जनहित के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और पहचान, नफरत और आरोप-प्रत्यारोप आगे आ जाते हैं।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि नागरिक सूचित निर्णय लें। और सूचित निर्णय के लिए जरूरी है निष्पक्ष जानकारी। यदि जानकारी ही दूषित हो जाएगी, तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा। समाधान का रास्ता और स्थिति चिंताजनक है, लेकिन निराशाजनक नहीं। इसे सुधारने के लिए तीन स्तरों पर काम करना होगा। पहला
मीडिया  संस्थानों को टीआरपी से ज्यादा विश्वसनीयता को तरजीह देनी होगी। संपादकीय स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी। फैक्ट-चेक डेस्क मजबूत करने होंगे। गलती होने पर सार्वजनिक रूप से सुधार प्रकाशित करने की संस्कृति अपनानी होगी। दूसरा पत्रकारों को फिर से यह याद करना होगा कि उनकी निष्ठा और जवाबदेही खबर और जनता के प्रति है, किसी दल या व्यक्ति के प्रति नहीं। स्रोतों की गोपनीयता, दस्तावेजों की जांच और "दूसरे पक्ष का बयान" लेना अनिवार्य शर्तें हैं। आत्म-आलोचना और निरंतर प्रशिक्षण जरूरी है। दर्शक और पाठक भी अब उतने ही जिम्मेदार हैं। एक ही खबर को 2-3 अलग स्रोतों से मिलाकर पढ़ने की आदत डालनी होगी। हेडलाइन देखकर शेयर न करें, पूरी खबर पढ़ें। प्रोपेगेंडा और जनमत बनाने वाली मुहिम को पहचानना सीखना होगा।
मीडिया जनता की आवाज है। यदि यह आवाज ही किसी की कठपुतली बन जाएगी, तो लोकतंत्र बहरा हो जाएगा। यह सच है कि खबर बेची जा सकती है, लेकिन भरोसा नहीं खरीदा जा सकता और जिस दिन जनता का भरोसा टूट गया, उस दिन अखबार, चैनल और पोर्टल जैसे संस्थान चाहे जितने बड़े हों, उनका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
निष्पक्षता कोई "विकल्प" नहीं है। यह पत्रकारिता की अनिवार्य शर्त है। वर्तमान परिदृश्य में जरूरत इस बात की है कि हम शोर नहीं, सच चाहें। सनसनी नहीं, समाधान चाहें। पक्ष नहीं, पक्ष-विपक्ष दोनों की बात चाहें। तभी मीडिया फिर से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बन पाएगा, वरना यह महज एक और उद्योग बनकर रह जाएगा।

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