डिजिटल क्रांति ने बनाया पत्रकारिता को आसान : विपुल जैन




अक्षय मेल ब्यूरो बागपत।

पहले की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में जमीन आसमान का अंतर आया है। पहले पत्रकारिता बहुत कठिन थी, लेकिन आज डिजिटल क्रांति ने पत्रकारिता को बहुत आसान बना दिया है। अब एक क्लिक पर देश-विदेश में न्यूज़ फॉरवर्ड की जा सकती है और वहां से न्यूज़ मंगाई भी जा सकती है। 

यह बातें वरिष्ठ पत्रकार एवं नेशनल अवॉर्डी विपुल जैन ने एक वार्ता के दौरान कही। कहा कि  वर्ष 1999 के आसपास का दौर उन्हें बखूबी याद है, जब उन्होंने पत्रकारिता क्षेत्र में कदम रखा था, उस दौर में ना तो व्हाट्सएप वाले फोन थे और ना ही इंटरनेट की कोई खास सुविधा थी। कुछ सरकारी दफ्तरों में ही गिने-चुने कंप्यूटर थे और जो कंप्यूटर न्यूज़ दफ्तरों में लगे थे तो इंटरनेट की सुविधा बहुत ही घटिया थी। केवल बीएसएनएल की ब्रॉडबैंड सेवा थी, जिसके सिग्नल इतने कमजोर हुआ करते थे कि एक-एक न्यूज़ को फॉरवर्ड करने में कई-कई घंटे कंप्यूटर पर आंख गड़ाकर बैठना पड़ता था। लेकिन आज डिजिटल क्रांति ने सब कुछ बदल कर रख दिया है। डिजिटल क्रांति पत्रकारिता क्षेत्र के लिए एक वरदान साबित हुई है। आज बहुत सारी कंपनियों की इंटरनेट सेवा मार्केट में आ गई है, जिसने पत्रकारिता को बहुत ही आसान बना दिया है। अब ना तो न्यूज़ व फोटो के लिए ज्यादा भागदौड़ करनी पड़ती और ना ही किसी तरह की कोई माथापच्ची। सिर्फ एक क्लिक पर ही सब उपलब्ध हो जाता है।


खत्म हुआ कागज-पैन का जमाना
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विपुल जैन बताते हैं कि उनके जमाने में सब काम कागज और पैन से हुआ करता था। उनका पूरा दिन कागज और पैन के माध्यम से न्यूज़ लिखने में बीत जाया करता था। कई बार तो हाथ भी जवाब देने लगते थे, लेकिन उसके बाद भी मजबूरी थी की न्यूज़ लिखनी ही है, क्योंकि सवाल देश, समाज व जनता से जुड़ा हुआ था। लेकिन वर्तमान युग में कागज-पैन का जमाना खत्म हो गया है और सभी काम कंप्यूटर से होने लगे हैं, यह एक बहुत बड़ी क्रांति है।

फैक्स मशीनें थी न्यूज़ भेजने का माध्यम
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विपुल जैन ने बताया कि केवल फैक्स मशीने ही न्यूज़ के आदान-प्रदान का माध्यम हुआ करती थी। न्यूज़ लिखने के बाद उसे दिल्ली, मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद व नोएडा जैसे शहरों में स्थित हेड ऑफिस तक पहुंचाने के लिए पीसीओ पर जाना पडता था और वहां से फैक्स कर न्यूज़ भेजनी पड़ती थी। उस दौर में एक प्रिंट कागज को भेजने के लिए पीसीओ वाला 10 रुपये लेता था। हेड ऑफिस तक न्यूज़ पहुंचाना वास्तव में किले को जीतने के बराबर था।


बस के द्वारा आते थे न्यूज़ के पैकेट
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विपुल जैन बताते हैं कि बागपत जिले में उनके क्षेत्रीय संवाददाताओं द्वारा न्यूज़ के पैकेट बनाकर उन्हें बस द्वारा जिला मुख्यालय पर भेजा जाता था। संवाददाता लैडलाइन फोन के माध्यम से बागपत आने वाली बस का नंबर व टाइम नोट करा देते और उसके बाद टाइम से 15 मिनट पहले मुख्य चौराहे पर खड़े होकर बस आने का इंतजार करना पड़ता था। कई बार तो ऐसा होता था कि हम टाइम पर नहीं पहुंच पाते थे और न्यूज़ के पैकेट खेकड़ा, लोनी की तरफ चले जाते थे। तब सारी मेहनत एक क्षण में ही बेकार हो जाया करती थी।

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