अपर जिलाधिकारी (भू-राजस्व) राज कुमार द्विवेदी ने जनसामान्य को अवगत कराया है कि जनसामान्य की सुविधा के लिए भू-अभिलेखों एवं सेवाओं को पारदर्शी एवं सुगम तरीके से उपलब्ध कराने हेतु शासन एवं राजस्व परिषद द्वारा लगातार किए जा रहे प्रयासों के क्रम में राजस्व संहिता की धारा-30(1) एवं राजस्व संहिता नियमावली 2016 के नियम 25 के अनुसार क्षेत्रीक पंजी (भू-लेखा खसरा) के आर0सी0 प्रपत्र-4 को संशोधित कर उसके स्थान पर नया प्रारूप आर0सी0 प्रपत्र-4 (क) करते हुए उसका कंप्यूटरीकरण करने का निर्देश माननीय राजस्व परिषद के द्वारा दिया गया है। फसली वर्ष 1428 के पूर्व के वर्षों की क्षेत्रीय पंजियों (खसरा) का रख-रखाव आर0सी0 प्रपत्र-4 में ही किया जाएगा तथा उन्हें इस संबंध में समय-समय पर निर्गत शासनादेशो व परिषदादेशों के अनुसार अनुरक्षित व संरक्षित किया जाएगा। जिन क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 लागू है, उन क्षेत्रों में वर्षा 1428 व उसके बाद क्षेत्रीय पंजियों (खसरो) का रखरखाव निर्धारित प्रारूप आर0सी0 प्रपत्र-4 (क) में कंप्यूटरीकृत स्वरूप में किया जाएगा। फसली वर्ष की समाप्ति के उपरांत खसरा प्रविष्टियों को अपरिवर्तनीय बनाते (फ्रीज करते) हुए क्षेत्रीय पंजियों (खसरो) की प्रति पीडीएफ अथवा अन्य किसी अपरिवर्तनीय फॉर्मेट में परिषद स्तर पर राज्य डाटा केंद्र अथवा शासकीय इलेक्ट्रॉनिक क्लाउड जैसे मेघराज आदि में शाश्वत रूप से संरक्षित की जाएगी तथा उसकी एक मुद्रित प्रति अभिलेखार्थ तहसील स्तर पर भी 12 वर्ष तक संरक्षित की जाएगी। लेखपाल समस्त प्रविष्टियों की शुद्धता के लिए उत्तरदाई होंगे और उसे संबंद्ध व्यक्तियों से पूछताछ करके और खेतों के निरीक्षण द्वारा तथ्यों के संबंध में अपना समाधान अवश्य कर लेना चाहिए। खसरे को आठ भागों में बांटा गया है। खसरे के भाग तीन में दैवी आपदा से संबंधित प्रविष्टियां अंकित करने का प्रावधान है।

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